Friday, 20 September 2013

पुराना शहर

शहर ए वक़्त ए यार के हालात बदले से हैं
इन पुराने चेहरों के सवालात अब बदले से हैं।

आज साजन की याद आई है चलते हुए
शह ओ मात के खेल में अब सारे बिसात बदले से हैं।।

वो रंग जुनूं वो चैन सुकूँ अब कहाँ पहले से है।
शक है हमें की हम भी कुछ बदले से हैं।।

तुम वफ़ा जफा कसमों वादों की बात करते हो
इस शहर के तो परिंदों के मिजाज़ भी बदले से हैं।।

ना वो वो रहा ना रहा मेरा मुझमे कुछ बांकी
कुछ तस्वीरें  ही है जो  ज़ालिम पहले से हैं।

एक रहनुमा सा हुआ करता था इन उलझन भरी राहों में "शेत"
उलझन पहले से हैं रहनुमा ही हैं जो बदले से हैं।।

Monday, 2 September 2013

बदरिया

मैंने आज फिर पेड़ पे लटकती एक लाश देखी है
दरिया सडक धुंआ और एक ज़िन्दगी हताश देखी है।

राहतों का एक दौर आना अभी बाकी था मगर
ज़िन्दगी ने तो आज बस एक अधूरी तलाश देखी है।

अरमान भी दफ़न हो जायेंगे कुछ लोगों के आज
दो गज ज़मीन के चारो ओर सिसकती आस देखी है।

फूल तो आगे भी खिलेंगे गुलशन में बदस्तूर
किसी ने देखी हो रंगीनी मैंने तो बस सुखी घांस देखी है।

प्यार आशिकी दोस्ती यारी रिश्ते नाते सब
दिलासा हिम्मत टूटे झूटे सारे बकवास देखी है।

अब ना रखो उम्मीद की कारवां गुज़र गया
की आज मैने पेड़ पे लटकती हुई लाश देखी है।।

(मेरे क्षेत्र में हुए आत्महत्याओं के बाद )

Sunday, 1 September 2013

अभिव्यक्ती और लेखन

लेखन एक संघर्ष है और मै संघर्ष पसंद करता हूँ। ग़म हो या ख़ुशी ,चाहत या नफ़रत,समर्थन या विरोध ,अभिव्यक्ति ज़रूरी है और ज़रूरत भी। लिखना चाहिए। मन हल्का होता है।अभिव्यक्ति को ज़रुरत इसलिए कहा क्योंकि मानव सभ्यता का अस्तित्व ही सम्पूर्ण इतिहास में अभिव्यक्ति की मांग करता रहा है। वेद लिखे गए। इतिहास लिखा गया। धर्म जो आज भी समस्त संसार में अपने पंख पसारे हुए है चीख चीख कर अभिव्यक्ति की मांग करता है।
लेखन अभिव्यक्ती का सबसे सुन्दर माध्यम है। सुन्दर इसलिए नही कह रहा की शब्दों का मायाजाल इसमें होता है बल्कि इसलिए क्योंकि लेखन की उपज आन्तरिक विचारधाराओं से होती है। मानना ये है की आतंरिक उपज ही मनुष्य की निजी धरोहर होती है बाकी सभी आडम्बर मात्र हैं।स्वस्थ लेखन और नीच लेखन अलग बात है।आज के लिए इतना काफी है बाकी फिर कभी....तब तक आप भी लिखते रहिये..क्योंकि अच्छा लगता है।