शाम भी पंछियों के शोर का दामन थामे ढलने लगी
और ज़िन्दगी मेरे हाथों से रेत की मानिंद फिसलने लगी ।
हर जर्रा मानो छूटने को था बेताब मुझसे
मेरे दर्द -ए- हिज्रां से हवाओं की साँसें भी उखड़ने लगी ।
मेरा सफ़र ख़त्म हो चला या मंजिले हो गई रुसवा
जो मेरे पैरों की थकन भी अब संभलने लगी ।
ना राहत है न चैन है ना हंसी का पता न नींद की खबर
मानो कोई रात भयंकर दिन के साए में ढलने लगी ।
जो उदास बैठा ज़िन्दगी के लेखे जोखे में
तो उस शख्स की यादें मानो समंदर सी खंगलने लगी ।
धड़कन ख़ामोशी से सुन रही थी उसके दोहराए किस्सों को
और ज़िन्दगी उसकी आँखों की गहराई में ढलने लगी ।