जब सारे सितम सह लिए तो बा-अदब सर झुका के कहा
तेरे जुल्म-ओ-सितम के बावजूद तेरा गुलाम तेरा गुलाम ही रहा ।
न उफ्फ कहा न आह भरी न बेपर्दा किया ज़ख्मों को कातिल
होश खोते रहे तेरी मोहब्बत का मंज़र निगाहों में रहा ।
शहर का शहर मौजूद था दास्ताँ-ए-हश्र सुनने को मगर
न ज़िक्र किया न महफ़िल में तेरा नाम रहा ।
न तुम थे न दवा थी न दर्द-ए-हिज्राँ से राहत
तेरे वादों पे ऐतबार मरते दम तक रहा ।
लिखोगे कैसे दास्ताँ इस शाम की "शेत"
अब तो न हिम्मत रही बाँकी न दिल में कुछ करार रहा ।