Friday, 5 September 2014

न तुम थे न दवा थी...


जब सारे सितम सह लिए तो बा-अदब सर झुका के कहा
तेरे जुल्म-ओ-सितम के बावजूद तेरा गुलाम तेरा गुलाम ही रहा ।

न उफ्फ  कहा न आह भरी न बेपर्दा किया ज़ख्मों को कातिल
होश खोते रहे तेरी मोहब्बत का मंज़र निगाहों में रहा ।

शहर का शहर मौजूद था दास्ताँ-ए-हश्र सुनने को मगर
न ज़िक्र किया न महफ़िल में तेरा नाम रहा ।

न तुम थे न दवा थी न दर्द-ए-हिज्राँ से राहत
तेरे वादों पे ऐतबार मरते दम तक रहा ।

लिखोगे कैसे दास्ताँ इस शाम की "शेत"
अब तो न हिम्मत रही बाँकी न दिल में कुछ करार रहा ।

Wednesday, 30 July 2014

सफ़रनामा


शाम भी पंछियों के शोर का दामन थामे ढलने लगी
और ज़िन्दगी मेरे हाथों से रेत की मानिंद फिसलने लगी ।

हर जर्रा मानो छूटने को था बेताब मुझसे
मेरे दर्द -ए- हिज्रां से हवाओं की साँसें भी उखड़ने लगी ।

मेरा सफ़र ख़त्म हो चला या मंजिले हो गई रुसवा
जो मेरे पैरों की थकन भी अब संभलने लगी ।

ना राहत है न चैन है ना हंसी का पता न नींद की खबर
मानो कोई रात भयंकर दिन के साए में ढलने लगी ।

जो उदास बैठा ज़िन्दगी के लेखे जोखे में
तो उस शख्स की यादें मानो समंदर सी खंगलने लगी ।

धड़कन ख़ामोशी से सुन रही थी उसके दोहराए किस्सों को
और ज़िन्दगी उसकी आँखों की गहराई में ढलने लगी ।